Thursday, September 22, 2016

शोकधुन

बज रही है शोकधुन
आया किसी का लाल होगा।

बिजलियाँ उर में तड़पतीं
नयन से बहती हैं गंगा,
वीर को खूद में लपेटे
सिसकता गर्वित तिरंगा;

साथियों के वाद्य का
बिगड़ा हुआ सुर-ताल होगा।

लग रही जयकार होगी,
स्वजन की चीत्कार होगी,
असलहे देंगे सलामी,
पाक को धिक्कार होगी;

आँख में आँसू लिए
उन्नत पिता का भाल होगा।

रो रही होगी प्रिया,
बेटा करेगा सब क्रिया,
दिल पे पत्थर रखके चैनल
लेंगे सबकी प्रतिक्रिया;

रूप ज्वाला का चिता की
दिख रहा विकराल होगा।

दुश्मनी खो जाएगी फिर,
संधियाँ हो जाएंगी फिर,
लीडरों के बीच चुस्की
चाय की हो जाएगी फिर;

सैनिकों की इस नियति पर
मुस्कुराता काल होगा।

- ओमप्रकाश तिवारी