Wednesday, January 14, 2015

कांपती काया का घर

काँपती काया का घर
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तीन मंजिल
आठ कमरे
कांपती काया का घर,
खेलते
डॉलर में बच्चे
फिर भी हम हैं दर-ब-दर।

बैंक में
बैलेंस काफी
पेंशन भी कम नहीं,
है दिया
भगवान का सब
सच में कोई गम नहीं ;

साथ रख
बचपन से पाला
बस उसी नौकर से डर ।

पार्क में
कटती सुबह
हमजोलियों के साथ में,
और दोपहरी
भी एलबम
संग पुरानी याद में ;

रात को
शंकित करे मन
गूँजता खुद का ही स्वर ।

दिन यहाँ होता
तो होती
रात है परदेस में,
प्यार-आदर-फ़िक्र
सिमटे
फ़ोन के संदेश में ;

कौन
इंटरनेट का सीखे
अब बुढ़ापे में हुनर ।

(15 जनवरी, 2015)

Tuesday, January 6, 2015

काश ! अंतस तक पहुंचती ......


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काश !
अंतस तक पहुँचती
उष्मा तेरी किरण की।

क्या फ़रक पड़ता
रहो तुम
उत्तरायण-दक्षिणायण,
हाथ हो रोजी
सुबह की,
रात को रोटी नारायण ;

कामना
हमको नहीं है
भीष्म से पावन मरण की।

तुम मकर में जा रहे हो
तो हुआ
उत्सव हमारा,
हम मकड़जालों में उलझे
ढूंढते
अपना किनारा ;

स्वयं सारे
वस्त्र खोकर
चाह रखते आवरण की।

देव तुम जानो
तुम्हारी गति-दिशा
आवागमन,
चाहते हम सिर्फ
अपनी मति मलिनता
का शमन ;

रुक सके तो
रोक दो गति
आचरण के ही क्षरण की।
- ओमप्रकाश तिवारी