Tuesday, September 12, 2017

लिटिल स्टार

ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार
गुरुकुल ने ही डाला मार।

एडमीशन की लगी कतार,
डोनेशन पच्चास हजार,
इंटरव्यू देकर माँ-बाप
बैठे जोड़ मौत से तार ;

लेते मोटी-मोटी फीस
किंतु न कोई जिम्मेदार।

हम सब ऊँची चहें दुकान,
भले रहे फीका पकवान,
बच्चे का महंगा स्कूल
पिता समझता अपनी शान ;

चमक-दमक में हम सब चूर
भले व्यवस्था हो बीमार।

नखरे पाँच- पढ़ाई तीन,
सब स्कूलों का यह सीन,
पूर्वजों का सिखा-सिखाया
संस्कार भी लेते छीन ;

अंतर्मन में झांके कौन
जब स्कूल बने व्यापार।

- ओमप्रकाश तिवारी
12 सितंबर, 201
(रायन स्कूल में प्रद्युम्न की हत्या के बाद उपजा गीत) 

Thursday, August 24, 2017

संन्यास भी व्यापार है

आजकल
संन्यास भी
अच्छा-भला व्यापार है।

हैं पड़ी खाली
गुफाएं-कंदराएं
और जंगल,
महल जैसे
आश्रमों में, हो रहा
मंगल ही मंगल;

इस तरफ से
उस तरफ
ऐश्वर्य का विस्तार है।

गाड़ियों के
काफिले हैं
जींस है, टी-शर्ट है,
नए युग के
योग में, शामिल
'प्रभू' का फ्लर्ट है;

घेरकर बैठे
चहेते
झुक रहा संसार है।

है अजब व्यापार
इसमें
नोट भी है, वोट भी,
शक्ति ये देती छुपा
'इंसा' के
सारे खोट भी;

टेकती घुटने
इन्हीं के
सामने सरकार है।

अंधश्रद्धा बेचिए
या स्वप्न की
करिए तिजारत,
तर्क थोथे हो गए हैं
मूढ़पन में
फँसा भारत;

दोष किसको दें
भला, जब
सोच ही लाचार है।

- ओमप्रकाश तिवारी
25 अगस्त, 2017
(बाबा राम रहीम पर आनेवाले फैसले से ठीक पहले)

Sunday, July 30, 2017

अपनों का भारत

चलो गढ़ें
अपनों का भारत।
सोच - विचार
बहुत कर डाला
नहीं बना
सपनों का भारत,
सत्तर बरस
हुए यूँ जाया
सिर्फ द्वेष की
मिली तिजारत ;
गुणा-भाग
तक़सीम कर चुके
अब जुड़ने की
लिखें इबारत।
गुजर रहे क्यों
दिन औ रातें
बस आपस की
तक़रारों में,
बुरी खबर से
पटे पड़े हैं
सारे पन्ने
अखबारों में ;
प्रेम न मिलता
ढूंढे से भी,
बांट रहे हैं
लोग हिकारत।
हँसकर गले
न मिलना सीखा
साजिश रचते
दिखें पड़ोसी,
क्यों आरोप
मढ़ें औरों पर
कुछ तो होंगे
हम भी दोषी;
सफर चांद तक
करके लौटे
पर पड़ोस की
चाय नदारद।
- ओमप्रकाश तिवारी
(18 जुलाई, 2017)

Wednesday, July 12, 2017

कब तलक

क्या करें
तुम ही कहो,
यूँ कब तलक
लाशें गिनें, निंदा करें, आँसू बहाएं ?

कम नहीं होते
बरस सत्तर,
हमारा घर, सुलगता जा रहा है,
हम पड़े इस आस में
कोई बुझाने को
नदी की धार लेकर आ रहा है;

कुछ कहो
न चुप रहो,
क्यों मौन हैं अब
वो तुम्हारी धधकती संवेदनाएं ?

देश की सीमा नहीं
दिल्ली की सड़कें,
कर सको मंचन जहां नाटक का अपने,
न कटिंग की चाय
न सिगरेट आधी,
न वहाँ एसी में पलते मधुर सपने;

साफ कह दो,
शांति की
उम्मीद पाले,
और कितने दीप हम अपने बुझाएं ?

तुम सियासतदाँ
बदलकर कुर्सियाँ,
पट, कभी चित, जीतते रहते हो बाजी,
सैनिकों के सिर
कलम होते रहें,
स्वयं परचम तान कहलाते हो गाजी;

तुम नहाओ
दूध से,
धन से फलो नित,
पर बताओ, रक्त से हम क्यों नहाएं ?

- ओमप्रकाश तिवारी
(12 जुलाई, 2017)
[अमरनाथ हमले के तीसरे दिन]

Tuesday, July 11, 2017

अनुत्तरित है प्रश्न

अनुत्तरित है प्रश्न
पुनः कब
प्रभु लेंगे अवतार ।

नहीं परिस्थिति भिन्न
तनिक भी
त्रेता - द्वापर से,
नर-नर नाग बने
घर-घर में
दूषण औ खर से;

कब होगा इस
दैत्यवंश का
अब फिर से संहार ?

वही मंथरा
वही पूतना
वही नीतियां कूट,
बार-बार
शिव के हिस्से में
आता विष का घूँट;

दुर्योधनी
मगज में उपजे
अतिशय क्रूर विचार।

विभीषणों की
फौज खड़ी है, लेकिन
वह इस बार,
भ्राताश्री का
साथ दे रहे
'गलती' पूर्व सुधार;

स्वयं सोचते होंगे
प्रभु अब
कैसे पाएं पार।

- ओमप्रकाश तिवारी

(11 जुलाई, 2017)
अमरनाथ यात्रा बस पर गोलीबारी के बाद लिखा गया नवगीत। 

Tuesday, June 20, 2017

आभासी दुनिया

आभासी है सारी दुनिया
आभासी बाजार,
आभासी रिश्तों में अब तो
मगन दिखे संसार।

हुआ सवेरा पहला दर्शन
मोबाइल के नाम,
आभासी मित्रों से चर्चा
याद न आएं राम ;
गरम चाय की प्याली से ले
गुलदस्तों की भेंट,
और साथ में दुनिया भर के
मंत्रों की भरमार !

माँ-बापू की फ़िक्र किसे अब
बच्चे भी हैरान,
बस मोबाइल पर रहता है
पापा जी का ध्यान ;
वही वाट्सअप-वही फेसबुक
वही-वही ईृ-मेल,
वहीं मने होली-दीवाली
और सभी त्यौहार !

ना मंडी की रही जरूरत
ना जाना दूकान,
एक अंगूठा माल चुन रहा
दूजा दे भुगतान ;
चार इंच के मोबाइल पर
अब है पूरा मॉल,
जहाँ न कोई मोलभाव है
ना दे कोई उधार !

(20 जन, 2017) 

Wednesday, May 31, 2017

शिव तुम्हारे तांडव का ...


.....
शिव तुम्हारे तांडव का
मंच फिर तैयार है।
दिनदहाड़े रोज दिखता
हो रहा सीता हरण,
द्रौपदी के कक्ष तक
पहुँचे दुःशासन के चरण;
नेत्र खोलो तीसरा प्रभु
हो रहा अँधियार है।
बर्फवाली वादियों में
जल रहे चीनार हैं,
चिनगियाँ कैलास तक
पहुँची तुम्हारे द्वार हैं;
योग निद्रा से नहीं होना
प्रभू निस्तार है।
इंद्र पद का गर्व सत्ता
साथ ले आती यहां,
प्राप्ति-सिंहासन प्रजा का
दर्द बिसराती यहां;
ये धरा अब असुर कुल का
चाहती संहार है।
- ओमप्रकाश तिवारी
30 मई, 2017
सुबह - 9.50 बजे